कोलकाता : आज 16 अगस्त 2025 को पूरे भारत में Janmashtami 2025 का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव पर मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है, जबकि घर-घर में भजन-कीर्तन और दही-हांडी की रौनक देखने को मिल रही है। यह त्योहार न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह हमें जीवन की मिठास और न्याय की शिक्षा भी देता है। जन्माष्टमी 2025 के इस अवसर पर, आइए जानते हैं इस पर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, महत्व और उत्सव की झलकियां।
जन्माष्टमी का ऐतिहासिक महत्व
जन्माष्टमी भगवान विष्णु के आठवें अवतार, श्रीकृष्ण के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण का जन्म लगभग 5,000 वर्ष पूर्व मथुरा में देवकी और वासुदेव के यहां हुआ था। उस समय मथुरा पर राजा कंस का अत्याचार था, जो अपनी बहन देवकी के आठवें पुत्र से अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी से डरता था। इसी कारण कंस ने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया था। लेकिन ईश्वरीय लीला से श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ, और वासुदेव उन्हें गोकुल में यशोदा और नंद के पास पहुंचा आए।
यह कथा हमें सिखाती है कि अन्याय के विरुद्ध सत्य और धर्म की विजय अवश्य होती है। ब्रिटैनिका के अनुसार, जन्माष्टमी हिंदू कैलेंडर के भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर में अगस्त-सितंबर के आसपास आती है। इस वर्ष Janmashtami 2025 की तिथि 16 अगस्त है, जब निशिथ पूजा का समय रात 12:04 बजे से 12:47 बजे तक है, जैसा कि द्रिक पंचांग ने बताया है। इतिहासकारों का मानना है कि श्रीकृष्ण का जन्म 3228 ईसा पूर्व हुआ था, जो बीबीसी की रिपोर्ट में भी उल्लेखित है।
जन्माष्टमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
Janmashtami 2025 केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण का माध्यम है। श्रीकृष्ण को अनंत आनंद का प्रतीक माना जाता है, जैसा कि श्री श्री रविशंकर की वेबसाइट पर वर्णित है। इस पर्व पर भक्त व्रत रखते हैं, भगवद्गीता का पाठ करते हैं और रासलीला का आयोजन करते हैं। इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (ISKCON) के अनुसार, यह त्योहार हमें भक्ति मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। श्रीकृष्ण की शिक्षाएं, जैसे कर्मयोग और भक्तियोग, आज भी प्रासंगिक हैं।
विशेष रूप से, Janmashtami 2025 पर भक्तों द्वारा रखा जाने वाला व्रत स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि उपवास से शरीर की detoxification होती है, जो आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी वर्णित है। विकिपीडिया के अनुसार, मणिपुर में यह पर्व विशेष रूप से रासलीला नृत्य के साथ मनाया जाता है, जबकि महाराष्ट्र में दही-हांडी की परंपरा प्रचलित है।
देशभर में जन्माष्टमी 2025 की धूम
इस वर्ष Janmashtami 2025 की रौनक पूरे देश में देखने को मिल रही है। मथुरा और वृंदावन में लाखों श्रद्धालु एकत्र हुए हैं, जहां मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, मथुरा में रासलीला के आयोजन में 10 लाख से अधिक पर्यटक भाग लेते हैं। दिल्ली के ISKCON मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया, जहां भक्तों ने भजन गाए और प्रसाद वितरित किया।
महाराष्ट्र में दही-हांडी प्रतियोगिताएं जोरों पर हैं। मुंबई में गोविंदा पथक द्वारा बनाई जाने वाली मानव पिरामिड की ऊंचाई कभी-कभी 40 फीट तक पहुंच जाती है, जो एक रोमांचक दृश्य प्रस्तुत करती है। हालांकि, सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, महाराष्ट्र सरकार ने ऊंचाई सीमा निर्धारित की है। दक्षिण भारत में, विशेष रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक में, घरों में कोलू (गुड़िया प्रदर्शनी) सजाई जाती है। असम सरकार की वेबसाइट पर उल्लेखित है कि वहां जन्माष्टमी को नमघरों में विशेष सत्संग के साथ मनाया जाता है।
गुजरात में Janmashtami 2025 को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में जाना जाता है, जहां नृत्य और संगीत की महफिलें सजती हैं। भारत सरकार की उत्सव पोर्टल के अनुसार, यह त्योहार घरों को सजाने, नए कपड़े पहनने और पारंपरिक खेलों के माध्यम से मनाया जाता है। वैश्विक स्तर पर, अमेरिका और यूके में भी भारतीय समुदाय जन्माष्टमी मना रहा है, जो हिंदू संस्कृति की वैश्विक पहुंच को दर्शाता है।
जन्माष्टमी के रीति-रिवाज और व्यंजन
Janmashtami 2025 पर भक्त सुबह से व्रत रखते हैं और आधी रात को पूजा करते हैं। पूजा में बाल कृष्ण की मूर्ति को झूले पर झुलाया जाता है, और आरती की जाती है। प्रसिद्ध आरती “आरती कुंजबिहारी की” गाई जाती है। व्रत के दौरान फलाहार जैसे फल, दूध और मखाना खाया जाता है। ईज माई ट्रिप की रिपोर्ट के अनुसार, माखन मिश्री और पंजीरी जैसे व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जो श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से प्रेरित हैं।
आधुनिक समय में, Janmashtami 2025 को पर्यावरण-अनुकूल तरीके से मनाने की अपील की जा रही है। कई संगठन प्लास्टिक मुक्त सजावट और जैविक रंगों का उपयोग कर रहे हैं।
चुनौतियां और सकारात्मक पहलू
हालांकि Janmashtami 2025 का उत्सव खुशी का प्रतीक है, लेकिन दही-हांडी जैसे आयोजनों में चोट लगने की घटनाएं चिंता का विषय हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्षों में कई दुर्घटनाएं हुईं, जिसके चलते सुरक्षा नियम सख्त किए गए हैं। फिर भी, यह त्योहार एकता और भाईचारे को बढ़ावा देता है।
अधिक जानकारी के लिए, आप ब्रिटैनिका की इस आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं: Janmashtami – Britannica। साथ ही।
Tathya Times: राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचारों का विश्वसनीय स्रोत
निष्कर्ष: जन्माष्टमी हमें क्या सिखाती है?
Janmashtami 2025 हमें याद दिलाती है कि जीवन में चुनौतियां आती हैं, लेकिन भक्ति और कर्म से हम उन्हें पार कर सकते हैं। श्रीकृष्ण की लीलाएं हमें हंसते-खेलते जीवन जीने की कला सिखाती हैं। इस पर्व पर सभी को शुभकामनाएं!

















